सीख रहा हूँ !…..

Sometimes I write Poem just for no reason but for expressing my experience, feeling this poem is also one of them ………

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Life is Fight of oneself with oneself Be ready !! Be prepared !!
 
सीख रहा हूँ ,
मैं भी अब जिंदगी के उसूलो को
कुछ हँसना कुछ औरो को हँसाना ,
 
सीख रहा हूँ ,
पहचानना भी अब जिंदगी के रसूलो को
रोते हुए भी अपने को हँसते दिखाना ,
 
सीख रहा हूँ
बड़ी आसानी से खुद को खुदी से चुराना ,
बड़ी बेराह सी जिंदगी हो गयी है यारो ,
जाने ! क्यों किस लिए इतना भाग रहा हूँ ,
न जाने क्या खोना क्या पाना चाह रहा हूँ,
 
सीख रहा हूँ
माँ बाप से बड़ी आसानी से झूँठ बोल जाना ,
तरक्की के भ्रम में माँ बाप से दूर हो जाना,
 
सीख रहा हूँ
की बचपन ही काफी अच्छा था ,
जीवन काफी अच्छा था जब तक मैं बच्चा था,
 
सीख रहा हूँ
उन रिस्तो की अहमियत जो मिसाल थे ,
आज की तरह नही फसे थे इतने जाल में,
आज की तरह कभी नही फसे थे जाल से ,
 
सीख रहा हूँ
माँ की समता को,
निर्मल ,पवन सी उसकी सरस ममता को ,
उस ममता को जाने क्यों मैं तौलने लगा ,
जिंदगी में आधुनिकता क्या आई ,
न जाने क्यो उस ममता को भूलने लगा |
 
सीख रहा हूँ
सीखता हूँ तो और सिखाती है जिंदगी ,
लड़ता हूँ तो
और आगे ले के जाती है जिंदगी,
बेसक हारता हूँ हर बार मैं
इस जंग में जिंदगी से ,
पर हर हार में ,
कुछ न कुछ नया सिखाती है जिंदगी ।।

– Ramkinkar das tripathi

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