विजयदशमी पर मेरी कुछ चंद लाइने

कुछ जलने दो अपने
भीतर के तिमिर संसार को ,
कुछ जलने दो रावण जैसे व्यवहार को,

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कुछ सीखो रावण जैसे ज्ञानी से ,
वो भी पथभ्रमित हो सकता है ,

अभिमान किसी को हुआ तो फिर ,
वो प्रकांड ज्ञान भी
काम नही आ सकता है,

अभिमान पर स्वाभिमान की
जीत हमेशा होती है ,
रावण कितना भी बलसाली हो
सत्य राम की जीत हमेशा होती ।।
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भारत द्वारा पाकिस्तान पर किये #सर्जिकल स्ट्राइक पर मेरी कविता

आज भारतीय सेना के द्वारा #SurgicalStrikes(लक्ष्यभेदी हमला) करके पाकिस्तान को उसके घर में जा कर मारा ।जब मैंने ये न्यूज़ पढ़ी तब ख़ुशी में कुछ लाइने अनायास ही
निकल पड़ी ……

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We the People of India Proud On Indian Army

तुरंत जहन्नुम पँहुचा दो ,इन जिन्ना के बेटो को ,
श्मशान बना दो आतंकों के इन ठेको को
चुन चुन कर मारो इन किस्मत के हेटो को,

दुनिया से नाम मिटा दो इन आतंकी बाप के बेटो को,

सेना को खुली छूट दे दो,
अबकी बार तो रण चंडी का आवाह्न करो ,

नाग ,त्रिशूल ,पृथ्वी को क्यों रखे हो इनका भी संधान करो,

बहुत हुआ है भारत माँ का अपमान है ,
बहुत हुआ है इन दुष्टो का सम्मान है ,

अगली 2 लाइन भारत प्रधानमंत्री के लिए है ..!

खुला हाथ है शेरो का अब तो बंद नही करना तुम,

शांति शांति वार्ता का छंद नही पढ़ना अब तुम ।।

Jai Hind 💪
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मेरी बहन पर मेरी एक छोटी कविता

मेरी बहन पर मेरी एक छोटी कविता

संसार की उन तमाम बहनो के लिए जो भाईयो के लये अनगिनत दुआएँ करती ही रहती है ।मेरी छोटी से कविता से प्रणाम करता हूँ।

कौन सा छंद लिंखू ए बहन तेरे लिए ,
कौन सा गीत लिंखू ए बहन तेरे लिए ,
तू मेरे छन्दों की ,गीतो की शब्दसः बोली है ,
मेरी हर खुशियो की तू ही तो रंगोली है ,

तेरे बिना न पता ये मेरा खुशनुमा बचपन,
खट्टा मीठा ये अल्हड रंगीन सा अपनापन,
तूने ही तो चलना सिखलाया था मुझे,
गिर के उठाना कैसे है समझाया था तूने ही

तू न होती तो सायद मै अधूरा था,
तेरे बिना तो मै कभी पूरा न था ,
तू मेरे लिए अपने स्वप्नों को भूल गयी
मै आगे बढ़ जाऊँ तू पढ़ाई तक छोंड गयी,

कैसे -कैसे !ये कर्ज तेरा मै चुकलुँगा ,
दुआ करता हूँ ईस्वर से अगले जन्म में  ,
तुझे ही तुझे ही ए बहन  पाऊँगा ।।

“आपका एक भाई”
Ramkinkar das Tripathi
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पथिक

पथिक
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पथिक हूँ चलना हमारा नाम है ,
बाधाओ से लड़ना हमारा काम है ,
जिंदगी भी एक पथिक ही है दोस्तों
इस जिंदगी में आगे बढना हमारा काम है।।

सफलता या असफलता में भी बढना हमारा काम है ,
पथिक है जिंदगी के आगे चलना हमारा काम है ,
रुकना,थकना तो असफलता की निसानी है,
और असफलता किसको रास आनी है ।

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पथिक है जिंदगी के चलना हमारा नाम है
आगे बढना ,असफलताओ से न डरना हमारा काम है ,

एक असफलता हज़ार सफलता की निसानी है ,
बिना प्रयास किये सफलता की आस नादानी है,

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एक सफलता हजार असफलता की पहचान है ,
जिंदगी में अपनी पहचान के बिना भी क्या शान है ,
पथिक है हम जिंदगी के चलना हमारा काम है ,
पथिक है हम जिंदगी के चलना हमारा नाम है ।।

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Again Jai Hind

मुझे इंसान क्यों नही दिखता

बहुत दिनों की यात्रा में एक छोटी सी अपने मनोभावों के विचारो को कुछ पंक्तियों में सजोया है शायद आपके भी दिल की यही आवाज़ हो …….

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Kavi Ramkinkar das tripathi

मुझे इंसान क्यों नही दीखता ,

मुझे वो तिलक टोपी में खड़ा  ,
हिन्दू या मुसलमान क्यों दिखता है।

मुझे वो इंसान क्यों नही दिखता है ,

मुझेें योगी में भाई और ओवैसी में भाईजान क्यों दिखता है

मुझे हरेक इंसान नफ़रत से सना श्मशान क्यों दीखता है ,

मेरे मन से रामायण और कुरान के लिए अपमान क्यों निकलता है ,

मुझे हरेक कोई हिन्दू या मुसलमान क्यों दिखता है

मुझे इंसान क्यों नही दिखता है ,

मुझे वो बलात्कारी संत महान क्यों दीखता है ,

मुझे वो जाहिल कठमुल्ले अपने सामान क्यों दिखता है
 
इन्हे बचाने में अपने कौम का सम्मान क्यों दिखता है

मुझे इंसान क्यों नही दीखता

हिन्दू हूँ तो मुस्लिम दुश्मन सामान क्यों दिखता है,

मुस्लिम हूँ तो हिन्दू से जलने में इमान क्यों दिखता है ,

मुझे इंसान क्यों नही दीखता

जब कहते हो एक खुदा ने बनाई धरती,
तो फिर उसमे इमान क्यों नही रहता,

मुझे इंसान में इंसान क्यों नही दिखता ।।
Kavi Ramkinkar das tripathi
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माँ पर कुछ मुक्तक भाग 2

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1.माँ को वृद्धाआश्रम छोड कर जब समुन्दर की गहराइयो में मोती चुनने गया

मोतियो ने धिकार्ते हुए कहा :-अपनी माँ के मोती को गिरा के पत्थर को बिनने चला आया ।

2.
जान्नत है मेरी माँ तो फिर मुझे जन्नत की जरुरत क्या है ,
मन्नत है मेरी माँ तो फिर मुझे मन्नत की जरुरत क्या है ,
एक दिन वो ‘आकाश’ आया था मेरी माँ के पांव छुने ,
मैंने अपनी माँ के पांव छु लिये ,आकाश छूने की जरुरत क्या है |

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3. मेरी माँ इतनी भोली है ,
मै गलती करता हूँ तो मुझे मार के खुद रोने लग जाती है ।।

4. बहुत सोचा बहुत सोचा पर कुछ न लिख पाया दोस्तों ,

माँ का प्यार ऐसा ही है मै तो क्या ईस्वर भी व्यक्त न कर पाया ।

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5.
इस तरह  ‘वो’ रश्म उल्फत निभाती रही ,
मेरी माँ खुद भूखी रही मुझे भरपेट खिलाती रही ,
मेरी गरीबी में बरसात में भी मेरी माँ देवी ही थी ,
खुद गीले में लेट कर मुझे सूखे में सुलाती रही ।।

6. ए ईस्वर तू मुझे गिरा सकता है हरा नही ,
जनता है क्यों क्योकि मेरे साथ मेरी माँ खड़ी है ।।
Kavi Ramkinkar das tripathi

माँ पर कुछ मुक्तक भाग एक पढ़ने के लिए यंहा क्लिक करे

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मदर्स दे पर मेरी माँ के लिए कुछ मुक्तक

कुछ पंकित्या मेरी माँ के लिए मेरे ह्रदय की अन्तःनिहित पंकितय है

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1.
मानसरोवर ,तेरी पवित्रता में चार चाँद लग गए
मेरी माँ के पाँव छू कर तेरे सरे पाप धूल गए ।
-Kavi Ramkinkar das tripathi
2.
अँधेरे से उजाला ढूंढ लाऊंगा,
होगी शाम तो सवेरा ढूंढ लाऊँगा,
माँ अगर तेरा आशीर्वाद हो मेरे साथ
मै पूरा विश्व जीत कर आ जाऊँगा।।
-kavi Ramkinkar das tripathi

3. बुलंदी पर होता हूँ तो किसे याद करूँ,
पता नही क्यों लगता है माँ को याद करुँ,
क्योकि वोहीवोही नीव का पहला पत्थर है,
वो पत्थर न होता तो फिर मै क्या हूँ।।
Kavi Ramkinkar das tripathi

4.
न जाने क्यों माँ अब भी मुझे सजाती रहती
है,
मै गलती करता हूँ तो भी पापा से बचाती रहती है।।
Kavi Ramkinkar das tripathi

5.
पता नही कैसे छोड़ देते है लोग माँ को वृध्हाआश्रम में ,
और मंदिर में खुशियो की दुआएँ मांगने जाते है ,
मंदिर में मूर्ति न हो तो भला वो मंदिर होता है क्या ?
Kavi Ramkinkar das Tripathi